सेवा भावना

सेवा भाव से की गई भक्ति ही ईश्वर की सच्ची पूजा है l
ईश्वर की भक्ति केवल मंदिरों में दीप जलाने, फूल चढ़ाने या मंत्र बोलने तक ही सीमित नहीं है, सच्ची भक्ति वह है जो सेवा भावना से जन्म लेती है l और मनुष्य के आचरण में भी झलकती है, जब हृदय में करुणा हो प्रेम हो और दूसरों की सहायता करने की कामना हो,तो यही भक्ति भावना है जो ईश्वर को प्रिय होती हैl शास्त्र में कहा गया है ईश्वर का हर जीव में निवास हैl और यदि ऐसा है तो भूखे को भोजन कराना, दुखी को सांत्वना देना और असहाय का सहारा बनना भी तो पूजा ही है l बिना अपेक्षा बिना दिखावे से की गई सेवा अहंकार को गला कर आत्मा को निर्मल और पावन बनाती है l सेवा भाव से की गई भक्ति मन को शांति देती है, जब हम किसी दुखी इंसान के मुस्कुराने की वजह बनते हैं,तब हृदय में एक दिव्य आनंद का अनुभव होता है l यह आनंद किसी बाहरी पूजा विधि से नहीं बल्कि आत्मिक संतोष से प्राप्त होता है l आज के समय में जब भक्ति एक प्रदर्शन बनती जा रही है, तब सेवा भावना हमें सच्चा और सही मार्ग दिखाती है l सच्ची भक्ति यही है, जिसे मनुष्य अपने व्यवहार में प्रेम, क्षमा, सहनशीलता और सहयोग के रूप में उतारे l जो स्वयं के कष्ट भूल कर दूसरों के दुख को समझे l ईश्वर को पाने के लिए दूर जाने की आवश्यकता नहीं है l वे सदा वहीं पर मिलते हैं जहां सेवा है करुणा है और निस्वार्थ भाव है lजब भक्ति में सेवा जुड़ती है, तब जीवन स्वयं एक मंदिर बन जाता है और हर कर्म पूजा 👏 मंदिर की घंटियां बजाने से नहीं,करुणा और प्रेम से भरे कर्मों से ईश्वर प्रसन्न होते हैं l जो हाथ दुखी के आंसू पोंछते है, उन्हीं हाथों की सेवा प्रभु स्वीकार करते हैं l
इसीलिए हमें परस्पर एक दूसरे की सेवा द्वारा सदैव संतुष्ट और प्रसन्न रहना चाहिए, और अपने प्रभू का प्रेम पाने के लिए निरंतर सेवा, भक्ति द्वारा प्रयास रत रहना चाहिए l
निष्कर्ष 👏श्री तुलसी दास जी द्वारा रचित चौपाई से मैं इस लेखनी को विराम देती हूँ l
परहित सरिस धरम नहीं भाई l
पर पीड़ा नहि सम अधमाई ll 🙏
शब्द साधना✍️
ममता प्रकाश🙏🙏🙏

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