अपनी लेखनी की शुरुआत मैं कबीर दास जी के दोहे के साथ कर रही हूं l कहे कबीर नर अंध है गुरु क़ो माने और l हरि के रूठे ठोर हैl गुरु रूठे नहीं ठोर ll
जीवन में अनेक रिश्ते होते हैं अनेक मार्गदर्शन मिलते हैं लेकिन गुरु का स्थान सबसे अलग और विशेष होता है गुरु केवल हमें ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाने वाला प्रकाश भी बनते है l जब मन भ्रमित होता है दिशा स्पष्ट नहीं होती तब गुरु ही वह दीपक बनते है, जो अंधकार में मार्ग दिखाते है l गुरु हमें केवल बाहर की दुनिया को समझना ही नहीं सिखाते बल्कि अपने भीतर झांकना भी सिखाते है वह सिर्फ हमारे प्रश्नों के उत्तर ही नहीं देते हमें सही प्रश्न करना भी सिखाते हैं, जब हम अध्यात्म में कदम रखते हैं तो गुरु का महत्व और भी गहरा हो जाता है l आत्मा की यात्रा अकेले तय करना कठिन होता है ऐसे में गुरु वह सहारा बनते हैं,जो हमें भटकने से बचाते हैं l वह शब्दों से कम अपने आचरण से हमें ज्यादा सिखाते हैंl गुरु का स्थान केवल सम्मान का नहीं बल्कि विश्वास का होता है जहां तर्क रुक जाते हैं वहां श्रद्धा शुरू होती है यही श्रद्धा मनुष्य को विनम्र बनती है और विनम्रता ही ज्ञान का वास्तविक द्वार है l आज के समय में हम जानकारी को ही ज्ञान समझ लेते हैं लेकिन गुरु हमें यह बोध कराते हैं कि ज्ञान का उद्देश्य अहंकार नहीं बल्कि जागरूकता है गुरु हमें सत्य से परिचित कराते है किसी ने सच ही कहा है गुरु हमारे बाहर ही नहीं भीतर की भी जागृति करते हैं और जब भीतर गुरु जाग जाते हैं,तब जीवन साधना बन जाता है गुरु के स्थान की महिमा शब्दों से परे हैl
जब मन थक जाता है l तब भक्ति ही सहारा बनती है l l
पर हम जाने कैसे की मन थक गया, क्योंकि मन तो हर पल चलायमान है l रुकता ही नहीं, आज के इस शोर भरे दौर मे हम विश्राम ले भी तो कैसे l पर हाँ अगर कुछ पल मौन होकर आँखे बंद कर अपने भीतर जाये तो पायेंगे की सच्ची शांति तो यही है, और जो हमें अपने पास देख कर मुस्कुरा रहा है l वही तो मेरा अपना मेरा प्रभु मेरा भगवान है,और ये विश्वास ही हमें भक्ति से परिचय कराता है l की हर तरह से टूट कर बिखरने पर जो हमारा सच्चा सहारा बनती है, वो है हमारी भक्ति l
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Nice blog