एक राजा ने बहुत जल्दी प्रसिद्धि पाई,कई राज्यों पर विजय प्राप्त की l अचानक उसके मन में आया कि मैं कितना शक्तिशाली राजा हूं l ये लोगों को बताने के लिए, मैं एक पत्थर पर्वत की सबसे ऊंची चोटी पर लगाऊंगा l ताकि लोगों को पता चले कि मैं कितना समृद्धि शाली राजा था l यह सोचकर वह अपने कुछ सैनिकों को लेकर पर्वत की चोटी की तरफ बढ़ा, कई दिन लगे उसको पहुंचने में जो ऊपर पहुंचा तो वहां एक साधु महात्मा तपस्या में लीन थे👏 उनको देखते राजा ने प्रणाम किया l उनको आशीर्वाद देते हुए महात्मा ने पूछा कहो राजन किस कार्य से यहां आना हुआ l राजा बड़े अहंकार से तन कर बोला महाराज आप नहीं जानते मैंने कई राज्यों को जीत कर एक बड़ा समृद्धशाली राज्य हासिल किया है l और आज मैं अपने नाम का पत्थर इस ऊंची पर्वत की चोटी पर लगाने आया हूंl पर सोच रहा हूं कहां लगाऊ l महात्मा मुस्कुराए और बोल बेटा कहीं जगह दिख रही हो तो लगा लो l बहुत से लोग यहां आए अपने नाम के पत्थर लगाने और और वापस अपना नाम देखना ना आ सके राजा ने नजर घुमाई देखा चारों तरफ पत्थर ही पत्थर पड़े थे पर कहीं किसी का नाम दिखाई नहीं दे रहा था l राजा की नजरे अचानक झुक गई महात्मा के चरणों पर गिर पड़ा और बोला मेरे कुछ अच्छे कर्म थे👏 जो आपसे मुलाकात हुई और सत्य का ज्ञान हुआ अब मैं लोगों के दिलों में अपने अच्छे कर्मो से जगह बनाने की कोशिश करूंगा l और यह कहकर राजा एक नई ऊर्जा के साथ वापस लौट गया 🙏
निष्कर्ष – अहंकार हमें ऊंचे उठाता है, तो एक अकड़ भी भर देता है l पर झुकने की कला हमें नम्रता से ही आती है 🙏जो हमें आसमान की बुलंदियों पर बिठा देती है l👏
शब्द साधना की लेखनी से 🙏
ममता प्रकाश
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